औरत हो सिर्फ औरत तो मर्द कई हैं।
कुत्ते के तर्जुमा में हमदर्द कई हैं।।
औरत न सिर्फ औरत तो बात बड़ी है।
कुत्ते के तर्जुमा में खतरनाक बड़ी है।।
औरत न कोई औरत, न मर्द बड़ा है।
इंसा के तर्जुमा में इंसान बड़ा है।।
13.5.08
औरत हो सिर्फ औरत तो....
12.5.08
अब होश में आ जाओ दिल्ली के खुदावंदो!
इतनी भयानक तस्वीर!
इतने खतरनाक हालात!!
....तो फिर क्या होने वाला है?
कुछ-न-कुछ होगा जरूर,
आज नहीं, तो कल।
सुनो
तुम सब सुनो।
उनकी तादाद अरबों में होने वाली है।
वे जब उठेंगे
ललकारेंगे, घहराएंगे तो दुनिया तो कांप उठेगी।
सुनो उन्हें
सोचो कि वे अनगिनत
जिस दिन हरामखोरों पर कहर बन कर टूटेंगे
क्या हालात होंगे दुनिया के
देश के और अपने आसपास के।
होश में आओ हुक्मरानो!!!
क्योंकि उनके सुर में सुर मिलाकर कह रहा है जेम्स वेल्डन जानसन
हरेक आवाज और गीत को
उठाओ इतना ऊंचा
कि धरती और आकाश झनझना उठें
मुक्ति की ताल पर थिरक उठो
और गूंजने दो इतनी गहराई से
जैसे फनफनाते समुद्र की हुंकार।
तो ऐसा है दुनिया भर में बेरोजगारी का खौफनाक चेहरा।
देखिए, कुछ बानगियां........
अमेरिका (कतरनेंः1)
अमेरिकी श्रम विभाग से जारी आंकड़ों के अनुसार अमीरों और साम्राज्यवादियों के इस स्वर्ग में भी बेरोजगारों की संख्या 35 हजार से बढ़कर 3 लाख 80 हजार तक जा पहुंची है। यहां का श्रम बाजार संकट के दौर से गुजर रहा है।
हिंदुस्तान (कतरनें ः2)
ग्यारहवीं योजना के अंत में देश में दो करोड़ 34 लाख बेरोजगार होंगे तथा बेरोजगारों की रफ्तार 4.8 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ेगी। यह योजना आयोग का अंदाजा है तो हकीकत कितनी भयानक है, कयास करिए।
बेरोजगारी गांवों में ज्यादा बढ़ी हैं। खेती-बाड़ी में लगे लोग बड़ी संख्या में बेरोजगार हो रहे हैं। कृषि श्रमिकों में 1993-94 में बेरोजगारी का का प्रतिशत 9.5 था जो 2004-05 में बढ़कर 15.3 प्रतिशत हो गया है। इसकी वजह कृषि उत्पाद में कमी होना है। गैर कृषि क्षेत्र में भी बेरोजगारों की तादाद 4.7 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही है। खास बात यह है कि आयोग ने खेती बाड़ी में काम करने वालों को हतोत्साहित करने की योजना बनायी है।
होश में आओ (कतरनेः3)
पिछले कुछ दशकों में बेरोजगारों की संख्या में विस्फोटक ढंग से वृध्दि हुई है। 1951 में बेरोजगारों की संख्या 33 लाख आंकी गयी थी। अगले दस वर्षों में यह 90 लाख हो गयी। अब यह संख्या 30 करोड़ से भी अधिक है। बेरोजगारी बढ़ने का सबसे बड़ा कारण उत्पादन का केन्द्रीकृत ढांचा है। लेकिन यही केन्द्रीकृत ढांचा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फलने-फूलने का सबसे मज़बूत आधार है। नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों में हमारे देश में उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण का दौर शुरू हुआ। विश्व बैंक और मुद्रा के इशारे पर आर्थिक नीतियां निर्धारित की जाने लगीं। इन नयी आर्थिक नीतियों की जड़ में ही बेरोजगारी समायी हुई है। नई आर्थिक नीतियों के मूल में भारी पूंजी, निवेश, व्यापार का वैश्वीकरण, निर्यात पर ज्यादा जोर, अधिक से अधिक मुनाफा, व्यवस्था में केन्द्रीकरण है। भारत में बेरोजगारी एक ऐसी गंभीर समस्या है, जो हमारी आर्थिक, सामाजिक और विधि व्यवस्था को तहस-नहस कर रही है। बढ़ती बेरोजगारी समस्या को हल नहीं किया गया तो देश में सामाजिक असंतोष फैल सकता है। कहा गया है कि बेरोजगारी का आत्मविश्वास को खत्म करती है तथा हीनता को जन्म देती है। सोच निराशावादी हो जाती है और मन में समाज के प्रति आक्रोश उत्पन्न होने लगता है। यही आक्रोश सामाजिक असंतोष का कारण बनता है। भले ही पढ़ने-सुनने में बेरोजगारी की भयावहता का अहसास न हो लेकिन बेरोजगार व्यक्ति के लिए तो जीवन मरण का प्रश्न बन जाती है। जब भूखों मरने की नौबत आ जाती है तो बेरोजगार लूटपाट, चोरी-डकैती, हत्या, फिरौती के लिए अपहरण जैसे अपराधों की ओर कदम बढ़ा देता है। कुछ लोग भिक्षावृत्ति एवं वेश्यावृत्ति जैसे अमानवीय वृत्ति अपना लेते हैं। इस प्रकार बढ़ रहे सामाजिक असंतोष तथा अपराध के अलावा भिक्षावृत्ति एवं वेश्यावृत्ति जैसे सामाजिक कुरीतियों का कारण भी बेरोजगारी ही है। बेरोजगारी की समस्या से समाज में दम घुटने जैसी स्थिति निर्मित है, कहीं परिवार का मुखिया बेरोजगार है, तो कहीं किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति का 'युवा पुत्र'। प्राय: हर परिवार का कोई न कोई व्यक्ति बेरोजगारी की पीड़ा सह रहा है। बेरोजगार व्यक्ति का जीवन उसके लिए एक तरह का अभिशाप बन जाता है। वह न तो जी सकता है और न ही मर सकता है। उसकी मनोव्यथा वैसी ही होती है, जैसी एक बकरे की कटने के लिए बूचड़ खाने में जाते समय होती है। बेरोजगार व्यक्ति अपनी ही निगाह में छोटा बन जाता है। उसके अंदर समाज में सिर ऊंचा करके चलने की हिम्मत नहीं रहती। क्योंकि वह हारा और थका हुआ होता है।
....और तब हो सकता है ये इंकलाबी स्वर एक बार फिर गूंज उठें.....
हर दिल में बगावत के शोलों को जला देंगे
हम जंगे-अवामी से कोहराम मचा देंगे...कोहराम मचा देंगे....कोहराम मचा देंगे।
मजलूम जो उठ बैठे, हर जुल्म पे भारी है
कुछ सोचकर ही हमने तलवार निकाली है
धोखों से फरेबों से भरमाया गया हमको
ये झूठ का सिंहासन ठोकर से गिरा देंगे.......ठोकर से गिरा देंगे...ठोकर से गिरा देंगे।
अब खूने-सितमगर को धरती से सजा देंगे
दिल्ली के खुदावंदो
दिल्ली के खुदावंदो
दिल्ली के खुदावंदो
ऐलान हमारा है......
11.5.08
वे रहजनों के काफिले शहर चले गए...
हमराह आहिस्ते से सफर पर चले गए।
8.5.08
एक पागल की कतरनें
भेडि़ये खाल बेंच रहे हैं
खरीद लीजिए।
अभी और ओले पड़ने वाले हैं
सिर मुड़ा लीजिए।
सियासत छिनाल हो गयी है
कुछ कर लीजिए।
महंगाई का टेंडर नीलाम हो रहा है
अमेरिका में जा बसिए।
ईश्वर-विक्रेता-संघ तीर्थाटन पर है
पापियों तर जाइए।
ये कविता-सविता नही, दिलजली है
चुटकी लीजिए।
(एक पागल की कतरनें)
5.5.08
सब अंधेरी रात के बदनाम साये लग रहे हैं
जिंदगी
देखकर इस भीड़ का मन
अब जिया जाता नहीं।
जिंदगी का दोहरापन
अब जिया जाता नहीं।
कुछ सुबह, कुछ दोपहर
कुछ सांझ की रंगत लिए
धूप का बहुरूपियापन
अब जिया जाता नहीं।
तोड़ता ही रह गया हूं
सिर्फ शीशों के मकां,
पत्थरों का मनोरंजन
अब जिया जाता नहीं।..............वाह्ह-वाह्ह-वाह्ह-वाह्ह
उम्मीद
आज सारे लोग जाने क्यों पराये लग रहे हैं।
एक चेहरे पर कई चेहरे लगाये लग रहे हैं।
बेबसी में क्या किसी से रोशनी की भीख मांगें
सब अंधेरी रात के बदनाम साये लग रहे हैं। ............वाह्ह-वाह्ह-वाह्ह-वाह्ह
14.4.08
दुबे जी का बेरोजगार दफ्तरः जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!
दुबे जी को वही जाने, जिसने कभी उनका जीवट देखा हो। नौकरी और रोजगार के एक-से-एक दमदार नुस्खे, जोरदार आइडियाज। जो सुने, कायल हो जाए। वाह-वाह कर उठे। वाकई दुबे जी जो बताते हैं, आज के रोजगार उस पर अमल करने लगें तो किसी के आगे हाथ फैलाने, दांत चियारने की नौबत न आए। कुछ इसी तरह की तरकीबों और दांव-पेंच से सत्तू नरायन हो गए श्रीसत्यनारायाण दुबे जी!
दुबे जी कहते हैं, आज के जमाने में भी नौकरियां उन्हें नहीं मिल रही हैं, जो नौकरियां खोज रहे हैं। उल्टे हजार-हजार नौकरियां उन्हें खोज रही हैं, और वे हैं कि बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं। लाखो-करोड़ों रुपये हवा में उड़ रहे हैं। बस पकड़ने का हुनर चाहिए। जिनके पास अक्ल है, उन्हें नौकरियां खोज रही हैं, उनके ही हाथों में उड़ते नोट सट्ट-सट्ट आ रहे हैं। उनके लिए दुनिया स्वर्ग है, हरी-भरी है, खूब भरी-पूरी है। जो अक्ल के पैदल और आंख के अंधे हैं, उनके लिए दुनिया नर्क है, मुश्किलों का अखाड़ा है, न नोट उनकी पकड़ में आ पाता है, न नौकरी।
बात 1980 की है। दुबे जी बताते कि....हजारों युवा लखैरों की तरह घूम रहे हैं। उन्हें देखकर तरस आता है और गुस्सा भी। तुम भी तो बेरोजगार हो। तुम क्या, तुम्हारे साथ दस और बेरोजगारों को बैठे-ठाले काम मिल जाएगा। बस, मैं जैसा बताता हूं, वह कर डालो। बगल में बनारस है। गंगा मैया वहां से गुजरती हैं। अपने दस बेरोजगार साथियों में से पांच को दिन की ड्यूटी पर लगाओ, पांच को रात की ड्यूटी पर। करना ये है कि बनारस से मुगल सराय जाने वाले रोड के गंगा-पुल पर नदी-तल में एक बड़ा-सा जाल बिछा दो। जो भी वाहन-ट्रेनें आदि पुल से जब गुजरते हैं तो सवारियां गंगा मैया के नाम पर पुल के नीचे पैसा फेंकती हैं। रोजाना हजारों रुपये। सारा पैसा जाल में इकट्ठा होता जाएगा। सुबह-शाम जाल समटे कर पैसे बटोर लिया करो दोनों हाथों से। लगे हर्र-न-फिटकरी, कमाई लाखों की। जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!
दुबे जी की महिमा अपरंपार। एक दिन बोले कि तुम्हे ऐसा काम बताता हूं, करोड़ों की कमाई हो जाएगा, लागत बस हजार-पांच सौ की। तुम्हारे कवि-गुरू श्याम नारायण पांडेय, अरे वही हल्दीघाटी वाले, यहीं बगल के गांव डुमरांव में रहते हैं। हल्दीघाटी महाकाव्य को कौन नहीं जानता। पांडेय जी के रोम-रोम में पैसा है। उनके रोम-रोम को बेंच डालो। कैसे कि......एक हजार पर्ची छपवाओ, उस पर स्लोगन होगा...हल्दीघाटी द्वार का निर्माण। कहां बनेगा हल्दी घाटी द्वार.... पंडित जी के गांव में। तुम बताओगे कि लागत आएगी पांच-दस करोड़। द्वार के लिए पंडित जी से एक पत्र लिखवा लो। उसकी एक हजार फोटो स्टेट करा लो। पर्ची और पत्रों का गट्ठर लेकर राजस्थान निकल जाओ। वहां के रजवाड़े-रईस महाराणा प्रताप के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं। उन्हें एक-एक पर्ची और पत्र की फोटो स्टेट थमाते जाओ, अपनी थैली भरते जाओ। एकाध महीने बाद इधर हल्दीघाटी द्वार के लिए डुमरांव रोड पर दो-चार हजार ईंटे गिरवा दो। फिर तो बेटा पर्ची काटते रहो, काटते रहो, थैली भरते रहो, भरते रहो। वैसे भी पंडित जी के पांव कब्र में लटके हैं, जाने कब टपक जाएं, फिर कौन पूछने वाला कि हल्दीघाटी द्वार के चंदे का क्या हुआ, अपना ठाट से गंगाघाट पर घर-मकान बनाकर काशी के हो जाओ। सात पुश्तें मजा करेंगी। जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!
वाकई दुबे जी कमाल के। पांच साल में उन्होंने पांच कारखाने खोले। एक-एक कर पांचों का दीवाला। दस परसेंट अफसरों को थमा कर बाकी करोड़ों का लोन गया दुबे जी के बैंक खाते में।
एक दिन दुबे जी ने कहा। भाई लोग हट्टे-कट्टे हैं। नौकरी के लिए दांत चियारे दर-दर भटक रहे हैं। और नौकरी पांव में पड़ी है। एक काम और। हजारों को रोजगार मिल जाएगा घर बैठे। क्या कि..... ज्यादातर बेरोजगार किसानों के बेटे हैं। सबके यहां खूब गेंहूं होता है। सौ-पचास दुकानदारों से एडवांस में आर्डर लो। गेहूं का दलिया पिसवाओ, गांव की मजदूरिनों से पैकेटिंग करवाओ, दनादन सप्लाई करो। हर किसान सरसों उगाता है। इसी तरह सरसो के तेल की सप्लाई करो। हमारे इलाके में तो चावल भी खूब होता है, इसके भी तरह-तरह के आइटम तैयार करो, बेंचो। दस तरह के आइटम गुड़ से बनते हैं। भैंस पालो, दूध बेंचो। देखो न, दूध के लिए कितनी मारामारी मची है। अरे कुछ नहीं, तो पत्ते से कितने तरह के सामान बनते हैं। उनकी बगल के बनारस में ही खूब खपत है। पत्ते बीनो, बेंचो। मालदार बन जाओ। कौन रोकता है तुम्हें ऐं! जो रहे काशी, उसको कहां उदासी। जय भोले!
12.4.08
आज क्या हुआ पापा !
हर शाम
जब घर लौटता हूं मैं
पूछती हैं मेरी बेटियां वही सवाल
कि आज क्या हुआ
पापा!
क्या जानना चाहती हैं वह मुझसे,
क्या सुनना चाहती हैं
नहीं मालूम मुझे।
उनका समवेत सवाल,
और मैं-
जैसे (वर्दीपोश के सामने)
बीती रात लुटे गांव वालों की पंक्ति में
किसी ताजा शिनाख्त के लिए
टांग दिया जाता है कोई एक खतरनाक चेहरा।
मैं समझ नहीं पाता
कि बार-बार उनके वही सवाल पूछने पर भी
अपने को पहचानने से
इनकार क्यों कर देता हूं?
जो सवाल पूरे दिन
तमतमाये बहेलिये की तरह करता रहता है
मेरा पीछा
धूल-धक्कड़, आंधी-पानी
या शीत लहरों में,
और जिसके नुकीले-अथाह ताप शिखर से
उतर-उतर कर
मेरे रंध्र-रंध्र में धंसती-धधकती रहती हैं
असंख्य लेजर किरणें।
लगभग रोज ही
मेरे जीवन की ऊब और थकान से
घबरायी हुईं
मेरी छोटी-छोटी जवाबदेहियां
अपनी-अपनी ठुडि्ढयों में घुटने घुसाकर
चुपचाप खाली पेट
सो जाती हैं सुबह होने तक।
अगली शाम के साथ लौट आते हैं
फिर वही सवाल
कि आज क्या हुआ
पापा!
उनके एक सवाल से जुड़े
ढेर सारे सवालात
काली-अंधेरी रातों की तरह
मुझे घेर लेते हैं।
किस मुंह से बताऊं उन्हें
कि नौकरियां
अब सिर्फ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में होती हैं
और बेटियों की शादियां
आर्यसमाज मंदिर
या आत्महत्या की तफ्तीश में।

